"ये जहां इतना खूबसूरत कहाँ होगा
मेरे सर पर छत भी नही होगी और तेरे सामने खूबसूरत मकां होगा..."
घुप अंधेरे में घर की चौखट पर खड़ी बूढ़ी दादी कहती हैं कि घर के ऊपर से बिजली के तार गए तो हैं पर घर में अबतक बिजली नहीं पहुंची। रात को जब इन बड़े-बड़े मकानों से आने वाली रौशनी घर पर पड़ती है तब कहीं जाकर अंधेरा छंटता है। तंग गलियों में बना दादी का घर जिसमें न कोई खिड़की है और न ही कोई रौशनदान, एक दरवाजा है जिसके बंद होने पर दिन में ही कमरों में अंधेरे जैसा माहौल रहता है, फिर रात का कहना ही क्या ? दादी कहती हैं कि सरकार ने झुग्गी और इन बड़े-बड़े मकानों के बीच एक दीवार खड़ी कर दी है। ये दीवार मानो किसी सरहद सी मालूम होती है। जो अमीरी और गरीबी के बीच खींची गई हों। जिसके दो तरफ दो वर्ग के लोग बसते हैं। वो कहती हैं कि बरसात के दिनों में छत से पानी टपकता है, जिसको ढंकने के लिए हम एक तिरपाल तक की व्यवस्था नही कर पाते हैं, वहीं दीवार के उसपार मकान पर मकान बनकर खड़े हो जाते हैं।एक दिल्ली में कितने प्रकार की दिल्ली बसती है, इसका अंदाजा दिल्ली के रंगपुर बस्ती में खड़े होकर महसूस किया जा सकता है। दादी कहती हैं कि इस उजाले और अंधेरे के बीच का अंतर हमारी गरीबी ही है और कुछ सरकार द्वारा खड़ी की गई ये दीवारें। दादी दुखी हैं, वो अपनी परिस्थितियों पर कहती हैं कि क्या करोगी बिटिया हमारा दुःख जानकर, “हम पैदा गरीब हुए थे, मर भी जाएंगे इसी गरीबी में, शायद हमारे भाग्य में यही लिखा हुआ है।“ सुविधाएँ क्या होती हैं ये हमने कभी जाना ही नही। उनके घरों में एसी (ac) लगी है और हमारे घर में बिजली तक नहीं पहुंची है। दादी की कहानी इस देश की कोई पहली घटना नही है, आप भारत के किसी भी कोने में चले जाएँ, ये समस्या आम है। हो सकता है कि सरकार में संवेदना मर गई हो, पर आम लोगों के मन में सवाल का न उठना भी मरी हुई नागरिकता को प्रदर्शित करता है। ये सवाल उठना भी लाजमी है कि एक समाजवादी, लोकतांत्रिक राष्ट्र में अमीरी और गरीबी के बीच इतनी खाई क्यों है ?
एक राष्ट्र एक संविधान की बात करने वाला देश दो भागों में बंटा हुआ क्यों प्रतीत होता है ?जहां एक ओर शाम को एक आदमी फिटबिड की घड़ी पहन कर एक्स्ट्रा कैलोरीज को घटाने के लिए घंटों ट्रेडमिल पर दौड़ता है, वहीं एक बूढ़ी दादी हैं जो सरकार द्वारा बंट रहे मुफ्त खाने की और दौड़ती हैं, कि कहीं खाना खत्म न हो जाए। ये कहना कितना बड़ा छलावा है कि देश तरक्की पर है, जहां देश का एक बड़ा तबका है जो अपनी मूलभूत जरूरतों तक को पूरा नहीं कर पा रहा है, उसके पास दो वक्त की रोटी तक नही है, उस पर सरकार हैं की विश्व गुरु का राग अलाप रही है।
जहां एक तरफ देश में बिजली, साफ पानी, रोजगार, शिक्षा, सुरक्षा जैसी अन्य जरूरतें तक पूरी नहीं हो पाती हैं, उस देश में नागरिकता, गाय-गोबर, चीन-पाकिस्तान, हिंदू-मुस्लिम पर घंटों बहस होती है। जिस देश में भूख और गंदे पानी पीने से लाखों लोग मर जा रहे हों. उस देश के लोग वैक्सीन को लेकर क्या ही जीने की उम्मीद रखें। ये कहना गलत नही होगा कि एक दिन देश में लोग कोरोना के बजाय असमानता से मर जाएंगे।
